19 जून : टोंस नदी पर प्रस्तावित किशाऊ बहुउद्देश्यीय बांध परियोजना को लेकर उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की सीमा से सटे जौनसार-बावर क्षेत्र में विरोध तेज हो गया है। स्थानीय लोगों का दावा है कि परियोजना के निर्माण से करीब 25 से 30 गांव जलमग्न हो सकते हैं, जिससे हजारों परिवारों के विस्थापन की आशंका पैदा हो गई है।
ग्रामीणों, सामाजिक संगठनों और जनप्रतिनिधियों का कहना है कि बांध बनने से क्षेत्र की वर्षों पुरानी बसाहटें, उपजाऊ कृषि भूमि, मंदिर और धार्मिक स्थल प्रभावित होंगे। उनका तर्क है कि पहाड़ी क्षेत्रों की संस्कृति, परंपराएं और कृषि आधारित जीवनशैली का मूल्यांकन केवल जमीन की कीमत के आधार पर नहीं किया जा सकता। लोगों ने प्रस्तावित पुनर्वास और मुआवजा नीति को भी अपर्याप्त बताया है।
पर्यावरण विशेषज्ञों ने भी हिमालयी क्षेत्र में इतने बड़े बांध निर्माण को लेकर चिंता जताई है। उनका मानना है कि इससे पर्यावरण और स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।
वहीं, सरकार का कहना है कि किशाऊ बांध परियोजना से दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान सहित छह राज्यों को पेयजल उपलब्ध होगा। इसके अलावा 660 मेगावाट बिजली उत्पादन और यमुना नदी में न्यूनतम पर्यावरणीय प्रवाह बनाए रखने में भी मदद मिलेगी। सरकार का दावा है कि परियोजना में आधुनिक भूकंपरोधी तकनीक और वैज्ञानिक पुनर्वास नीति अपनाई जाएगी।
जौनसार-बावर महासभा के अध्यक्ष मुन्ना सिंह राणा ने कहा कि बड़े विकास कार्यों का विरोध होना स्वाभाविक है, लेकिन क्षेत्र की भौगोलिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान को किसी भी कीमत पर खत्म नहीं होने दिया जाएगा।