31 मई: सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश सरकार को बड़ी राहत देते हुए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP), कृषि ऋण माफी, फसल बीमा और राज्य किसान आयोग के गठन से जुड़े हिमाचल हाई कोर्ट के निर्देशों को रद्द कर दिया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे मुद्दे सरकार की नीतिगत निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा हैं और इन पर फैसला लेना कार्यपालिका एवं विधायिका का अधिकार क्षेत्र है।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई की पीठ ने हिमाचल प्रदेश सरकार की ओर से दायर अपील पर यह फैसला सुनाया। मामला भारतीय गोवंश रक्षण संवर्धन परिषद की एक जनहित याचिका से जुड़ा था, जिसमें गो संरक्षण और बेसहारा पशुओं के मुद्दे उठाए गए थे। बाद में हाई कोर्ट ने किसानों से जुड़े विषयों को भी सुनवाई में शामिल करते हुए कई निर्देश जारी किए थे।
हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को 107 कृषि जिंसों पर MSP देने पर विचार करने, राज्य किसान आयोग गठित करने, लघु एवं सीमांत किसानों के 50 हजार रुपये तक के कृषि ऋण माफ करने की योजना बनाने और फसल बीमा का दायरा बढ़ाने जैसे निर्देश दिए थे।
हालांकि, सुप्रीम Court ने कहा कि संविधान न्यायालयों को सरकार को विशेष नीतियां बनाने या लागू करने के लिए बाध्य करने की अनुमति नहीं देता। अदालत के अनुसार MSP, ऋण माफी, फसल बीमा, आयोगों का गठन और सार्वजनिक संसाधनों का आवंटन जैसे विषय निर्वाचित सरकारों के अधिकार क्षेत्र में आते हैं।
पीठ ने अपने फैसले में कहा कि किसानों की समस्याओं पर चिंता जताना न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में है, लेकिन सरकार को किसी विशेष नीति को लागू करने का निर्देश देना संवैधानिक सीमाओं से परे है। अदालत ने यह भी माना कि राज्यों के वित्तीय संसाधन सीमित होते हैं और उनका उपयोग किस प्रकार किया जाए, यह निर्णय सरकार को ही लेना होता है।
इस फैसले को हिमाचल प्रदेश सरकार के लिए बड़ी कानूनी राहत माना जा रहा है।