40 किलोमीटर पैदल चलकर श्रद्धालुओं ने कराया शिरगुल महाराज का चूड़धार स्नान

1 जुलाई , रवि दत्त भारद्वाज : सिरमौर जिले के राजगढ़ क्षेत्र में आस्था, परंपरा और संस्कृति का अद्भुत संगम देखने को मिला। क्षेत्र के आराध्य देव शिरगुल महाराज की तीन दिवसीय पावन चूड़धार जातर श्रद्धा और धार्मिक उल्लास के साथ संपन्न हुई। नौ तबीन क्षेत्र सहित आसपास के गांवों से पहुंचे सैकड़ों श्रद्धालुओं ने लगभग 40 किलोमीटर की पैदल यात्रा कर सदियों पुरानी इस धार्मिक परंपरा का निर्वहन किया।

27 जून को राजगढ़ उपमंडल के शाया गांव से शुरू हुई जातर का पहला पड़ाव बांगा पानी में रहा। यहां देव पूजन और रात्रि विश्राम के बाद श्रद्धालु अगले दिन चूड़धार के लिए रवाना हुए। पाछले मोड़ पर विधिवत पूजा-अर्चना के बाद चूड़धार पहुंचकर वैदिक मंत्रोच्चार के बीच भगवान शिरगुल महाराज का पवित्र स्नान कराया गया। श्रद्धालुओं ने भी पवित्र स्नान कर विशेष पूजा-अर्चना में भाग लिया।

पूरी यात्रा के दौरान “जय शिरगुल महाराज” के जयघोष, भक्ति गीतों और शिरगुल गाथा से वातावरण भक्तिमय बना रहा। इस जातर की विशेषता यह रही कि श्रद्धालुओं ने पूरे मार्ग में सिर पर कोई वस्त्र या छत का सहारा नहीं लिया तथा खुले आसमान के नीचे रात्रि विश्राम किया। इसे वर्षों पुरानी धार्मिक आस्था और अनुशासन का प्रतीक माना जाता है।

वापसी पर जब जातर भगवान शिरगुल महाराज की जन्मस्थली शाया पहुंची तो श्रद्धालुओं का भव्य स्वागत किया गया। विभिन्न गांवों के लोगों ने फूल-मालाओं से जातर का अभिनंदन किया और श्रद्धालुओं के लिए चाय, पेयजल तथा जलपान की व्यवस्था की।

पूर्व मुखिया रणवीर सिंह ने बताया कि यह जातर प्रत्येक तीसरे वर्ष आषाढ़ माह के दूसरे रविवार को भगवान शिरगुल महाराज के चूड़धार स्नान के लिए निकाली जाती है। उन्होंने कहा कि इस बार भी नौ तबीन क्षेत्र सहित सैकड़ों श्रद्धालुओं ने पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ यात्रा में भाग लिया।

शिरगुल महाराज की यह पावन जातर केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत, सामाजिक एकता और लोक आस्था का जीवंत प्रतीक भी है। हर तीसरे वर्ष निकलने वाली इस यात्रा के माध्यम से सदियों पुरानी परंपराओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का कार्य किया जाता है।

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