बिलासपुर के ऐतिहासिक खन्नमुखेश्वर शिवलिंग को मिला नया स्वरूप, बढ़ी दिव्य आभा

27 जुलाई, अभिषेक मिश्रा: नगर के डियारा सेक्टर स्थित श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर में स्थापित पौराणिक एवं ऐतिहासिक खन्नमुखेश्वर शिवलिंग को नए एवं वास्तविक स्वरूप में संवारा गया है। शिवलिंग में मौजूद कुछ वास्तु एवं पारंपरिक दोषों का भी विधिवत सुधार किया गया है, जिससे इसकी दिव्यता और आध्यात्मिक आभा पहले से अधिक आकर्षक हो गई है।

मंदिर के पुजारी पंडित बाबू राम शर्मा ने बताया कि यह प्राचीन शिवलिंग छह मुखों और तीन नेत्रों से सुशोभित है तथा इसे भगवान कार्तिकेय का स्वरूप भी माना जाता है। भाखड़ा बांध बनने से पहले यह शिवलिंग व्यास गुफा और सतलुज नदी के मध्य स्थित प्राचीन खन्नमुखेश्वर मंदिर में स्थापित था। पुराने बिलासपुर शहर के विस्थापन के दौरान श्रद्धालुओं ने इसे नए शहर में लाकर श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर में स्थापित किया।

उन्होंने बताया कि करीब दो माह पूर्व कर्नाटक के संगेरी मठ के शंकराचार्य वेदांता भारती विशेष रूप से इस शिवलिंग के दर्शन के लिए बिलासपुर पहुंचे थे। उन्होंने इसे अत्यंत दुर्लभ और ऊंचाई वाला शिवलिंग बताते हुए इसे भूगर्भ में और अधिक स्थापित करने का सुझाव दिया था। बताया जाता है कि आदि शंकराचार्य के प्राचीन लेखों में भी इस स्थान पर स्थित शिवलिंग का उल्लेख मिलता है।

इसी क्रम में हरिद्वार से आए महामंडलेश्वर यमुनापुरी जी ने भी भूगर्भ स्थापना की अवधारणा पर मार्गदर्शन दिया। इसके बाद भगवान शिव के भक्त एवं लोक निर्माण विभाग से सेवानिवृत्त अधिशासी अभियंता (एक्सईएन) एन.आर. शर्मा के सहयोग से शिवलिंग का पुनर्संरक्षण कार्य कराया गया।

पंडित बाबू राम शर्मा ने बताया कि शिवलिंग की जलैहरी पहले पश्चिम दिशा की ओर थी, जिसे शास्त्रों के अनुसार संशोधित कर उत्तर दिशा की ओर कर दिया गया है। इससे शिवलिंग से जुड़े पारंपरिक दोष भी दूर हो गए हैं।

उन्होंने बताया कि प्राचीन समय में वर्षा नहीं होने पर बिलासपुर के राजा अपनी प्रजा के साथ यहां विशेष धार्मिक अनुष्ठान और ‘गडुआ प्रथा’ का पालन करते थे। धार्मिक मान्यता है कि इस शिवलिंग पर अर्पित जल से चर्म रोगों से राहत मिलती है, जबकि इसके समक्ष श्रद्धापूर्वक पूजा-अर्चना, तपस्या और ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र के जाप से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

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