6 मई: हिमाचल प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़ा एक गंभीर मामला सामने आया है, जहां चुनावी आचार संहिता और विभागीय प्रक्रियाओं के चलते डायलिसिस मरीजों की परेशानी बढ़ती जा रही है। निजी अस्पतालों के साथ हुए समझौता ज्ञापन (एमओयू) की अवधि 30 अप्रैल को समाप्त हो चुकी है, लेकिन अब तक उनके नवीनीकरण की प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाई है। इससे जीवन रक्षक इलाज पर निर्भर मरीजों के सामने संकट खड़ा हो गया है।
अस्पताल प्रबंधन के अनुसार, समझौता ज्ञापन के नवीनीकरण के लिए सभी आवश्यक दस्तावेज समय रहते शिमला स्थित संबंधित निदेशालय में जमा करवा दिए गए थे, लेकिन इसके बावजूद कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। विभाग की ओर से न तो नवीनीकरण किया गया है और न ही इस संबंध में कोई स्पष्ट जवाब दिया गया है। अस्पतालों का यह भी कहना है कि बकाया भुगतान को लेकर मामला हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय में पहुंचने के बाद अधिकारियों का रवैया और सख्त हो गया है।
इस देरी का सबसे अधिक असर उन मरीजों पर पड़ा है, जो आयुष्मान भारत योजना और हिमकेयर योजना जैसी सरकारी योजनाओं पर निर्भर हैं। अस्पतालों के अनुसार, सैकड़ों डायलिसिस मरीज नियमित उपचार न मिलने के कारण जोखिम में हैं। आर्थिक तंगी के चलते कई मरीज इलाज टालने को मजबूर हैं, जबकि कुछ मरीज इस उम्मीद में इंतजार कर रहे हैं कि जल्द समझौता ज्ञापन का नवीनीकरण होगा और उन्हें योजनाओं के तहत उपचार मिल सकेगा।
चिकित्सा विशेषज्ञों का कहना है कि डायलिसिस में देरी मरीजों के लिए बेहद खतरनाक हो सकती है और उनकी स्थिति तेजी से बिगड़ सकती है। अस्पताल प्रबंधकों ने इसे केवल प्रशासनिक देरी नहीं, बल्कि गंभीर मरीजों के प्रति संवेदनहीनता बताया है। उनका कहना है कि यदि जल्द समाधान नहीं हुआ, तो कई मरीजों की जान जोखिम में पड़ सकती है।