25 जून : उड़ीसा हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि पत्नी को पति की संपत्ति नहीं माना जा सकता और प्रत्येक बालिग महिला को यह अधिकार है कि वह अपनी इच्छा के अनुसार कहां और कैसे रहना चाहती है। अदालत ने कहा कि यदि कोई महिला वैवाहिक जीवन में उत्पीड़न या आपसी मतभेदों के कारण अलग रहने का फैसला करती है, तो उसे जबरन ससुराल लौटने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।
मुख्य न्यायाधीश हरीश टंडन और न्यायमूर्ति मुरारी श्री रमन की खंडपीठ ने एक हेबियस कॉर्पस याचिका की सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की। अदालत के समक्ष पति ने आरोप लगाया था कि उसकी पत्नी का अपहरण कर उसे अवैध रूप से बंधक बनाकर रखा गया है। हालांकि सुनवाई के दौरान यह स्पष्ट हो गया कि महिला अपनी इच्छा से ससुराल छोड़कर गई थी और वह किसी भी प्रकार की गैरकानूनी हिरासत में नहीं थी।
अदालत ने कहा कि महिला बालिग है और अपने जीवन से जुड़े फैसले स्वयं लेने में सक्षम है। यदि वह पति के साथ नहीं रहना चाहती, तो उसे उसकी इच्छा के विरुद्ध वापस भेजना कानून और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के सिद्धांतों के खिलाफ होगा।
खंडपीठ ने यह भी कहा कि हाल के वर्षों में वैवाहिक विवादों में हेबियस कॉर्पस याचिकाओं का दुरुपयोग बढ़ा है। कई मामलों में इस कानूनी उपाय का इस्तेमाल किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के बजाय पति या पत्नी पर दबाव बनाने के लिए किया जाता है। अदालत ने इसे चिंताजनक प्रवृत्ति बताते हुए कहा कि न्यायालय का उपयोग निजी विवादों में दबाव बनाने के साधन के रूप में नहीं किया जाना चाहिए।
मामले में अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता ने वास्तविक तथ्यों को सामने रखने के बजाय गलत आधार पर याचिका दायर की थी। इसके चलते याचिका को खारिज कर दिया गया। साथ ही अदालत ने याचिकाकर्ता को दो सप्ताह के भीतर राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण में 50 हजार रुपये जमा कराने का निर्देश दिया। यह राशि नाबालिग बच्चों के कल्याण के लिए संचालित खातों में जमा की जाएगी।