मैकलोडगंज में तिब्बत के पर्यावरण और बांध परियोजनाओं को लेकर उठे सवाल

1 सितंबर: धर्मशाला के मैकलोडगंज स्थित तिब्बती सेटेलमेंट कार्यालय में मंगलवार को ‘एशिया का जल टावर संकट में : तिब्बत-नेपाल फ्लैश फ्लड में पारदर्शिता की मांग’ विषय पर प्रेस ब्रीफिंग आयोजित की गई। अंतरराष्ट्रीय तिब्बत नेटवर्क और स्टूडेंट्स फॉर ए फ्री तिब्बत-इंडिया की ओर से आयोजित कार्यक्रम में वक्ताओं ने तिब्बत के हिमालयी क्षेत्र में निर्माण कार्यों और प्राकृतिक संसाधनों के दोहन को लेकर चिंता जताई।

तिब्बत नीति संस्थान की पर्यावरण एवं विकास विभाग की शोधकर्ता धोंडुप वांगमो ने कहा कि ग्लेशियर झील के टूटने से आई बाढ़ की जानकारी पहले सामने आ गई थी, लेकिन उनके अनुसार चीन की ओर से तिब्बत और नेपाल के लोगों को समय रहते इसकी चेतावनी नहीं दी गई। उन्होंने आरोप लगाया कि बाढ़ से जुड़ी सूचना चीन की सेना तक सीमित रही और आम लोगों को इसकी जानकारी नहीं दी गई। उन्होंने प्रभावित लोगों को हुए नुकसान की भरपाई और ऐसी घटनाओं के लिए जवाबदेही तय करने की मांग की।

अंतरराष्ट्रीय तिब्बत नेटवर्क की वरिष्ठ पर्यावरण शोधकर्ता डॉ. लोबसांग यांग्त्सो ने कहा कि तिब्बत के संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र में बड़े पैमाने पर बांध और अन्य ढांचागत परियोजनाएं विकसित की जा रही हैं। उन्होंने दावा किया कि करीब 190 बांधों की निर्माण योजनाएं पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकती हैं। उनके अनुसार बड़े बांधों और सीमा क्षेत्रों में निर्माण से हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित हो सकता है, जिसका असर तिब्बत के अलावा नेपाल, भारत और बांग्लादेश तक पड़ सकता है।

खिद्रोंग के भिक्षु जेन जाम्पा पालदेन ने कहा कि तिब्बत में प्राकृतिक संसाधनों का लगातार दोहन किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि ग्लोबल वार्मिंग के बीच हिमालयी क्षेत्र में बड़े पैमाने पर निर्माण और संसाधनों के दोहन से प्राकृतिक आपदाओं का खतरा बढ़ रहा है।

कार्यक्रम में ताशी धोंडुप ने तिब्बत में सूचनाओं पर नियंत्रण को लेकर चिंता जताई। उन्होंने आरोप लगाया कि आपदाओं से संबंधित जानकारियों को भी राजनीतिक सूचना बताकर रोका जाता है।

वक्ताओं ने तिब्बत के हिमालयी क्षेत्र में चल रहे निर्माण कार्यों और बांध परियोजनाओं पर अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की निगरानी बढ़ाने की मांग की। उन्होंने सितंबर में भारत में प्रस्तावित ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान चीन के साथ तिब्बत, ब्रह्मपुत्र नदी और पर्यावरणीय प्रभाव आकलन जैसे मुद्दों पर चर्चा की मांग की। साथ ही मेथोक बांध परियोजना को लेकर जवाबदेही तय करने और हिमालयी पर्यावरण की सुरक्षा के लिए ठोस कदम उठाने की अपील की।

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