27 अक्तूबर: हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने सरकारी भर्तियों में आरक्षण को लेकर अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि आरक्षित श्रेणी का कोई अभ्यर्थी यदि सामान्य श्रेणी के अंतिम चयनित उम्मीदवार से अधिक अंक प्राप्त करता है, तो उसे सामान्य श्रेणी की सीट पर समायोजित किया जाना चाहिए। ऐसे अभ्यर्थी को आरक्षित श्रेणी की सीट पर समायोजित नहीं किया जा सकता।
न्यायमूर्ति ज्योत्सना रिवाल दुआ ने कृष्णा कुमारी की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया। मामला ट्रेंड ग्रेजुएट टीचर (टीजीटी) आर्ट्स के 425 पदों पर भर्ती से जुड़ा है। हिमाचल प्रदेश राज्य चयन आयोग ने 27 मई, 2025 को इन पदों के लिए आवेदन आमंत्रित किए थे। इनमें सामान्य श्रेणी के 151 और अनुसूचित जाति (एससी) श्रेणी के 17 पद शामिल थे।
कृष्णा कुमारी ने एससी (बीपीएल) श्रेणी के तहत परीक्षा दी थी। अंतिम परिणाम में उन्हें 64 अंक मिले थे और वह इस श्रेणी की प्रतीक्षा सूची में पहले स्थान पर थीं। वहीं, मेरिट सूची में एससी (बीपीएल) श्रेणी के तीन अभ्यर्थियों ने 75.24, 73.06 और 71.86 अंक प्राप्त किए थे। इन तीनों के अंक सामान्य श्रेणी के कटऑफ 67.61 से अधिक थे।
चयन आयोग ने अदालत में दलील दी कि कार्मिक विभाग के 12 नवंबर, 2014 के निर्देशों के अनुसार, क्षैतिज आरक्षण की श्रेणियों में मेरिट के आधार पर अभ्यर्थियों को सामान्य श्रेणी में समायोजित करने का नियम लागू नहीं होता। हालांकि, हाई कोर्ट ने आयोग की इस दलील को स्वीकार नहीं किया।
अदालत ने स्पष्ट किया कि आरक्षण क्षैतिज हो या ऊर्ध्वाधर, यदि आरक्षित श्रेणी का कोई अभ्यर्थी सामान्य श्रेणी के अंतिम चयनित उम्मीदवार से अधिक अंक प्राप्त करता है, तो उसे सामान्य श्रेणी की सीट पर समायोजित किया जाना चाहिए।
इस फैसले के तहत हाई कोर्ट ने चयन आयोग को मेरिट सूची में क्रम संख्या 51 और 97 पर शामिल दो एससी (बीपीएल) अभ्यर्थियों को सामान्य श्रेणी में समायोजित करने के आदेश दिए। इससे एससी (बीपीएल) श्रेणी में रिक्त होने वाली सीट पर प्रतीक्षा सूची में पहले स्थान पर रहीं कृष्णा कुमारी को नियुक्ति देने का रास्ता साफ हो गया।