13 जून : पशुपालकों की आजीविका को सशक्त बनाने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करने के उद्देश्य से राज्य सरकार ने ‘हिमाचल प्रदेश चराई नीति-2026’ को मंजूरी दे दी है। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के नेतृत्व में तैयार की गई इस नई नीति में पारंपरिक प्रतिबंधात्मक व्यवस्था की जगह वैज्ञानिक और व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाया गया है।
नई नीति के तहत वन विभाग और पशुपालन विभाग मिलकर एक ऑनलाइन पोर्टल विकसित करेंगे। अगले छह माह के भीतर पशुपालकों को इस पोर्टल पर अपना नाम, पता, पशुओं की संख्या, पारंपरिक चराई मार्गों और पड़ाव स्थलों का पंजीकरण करवाना होगा। पंजीकृत जानकारी को हिम परिवार और भारत पशुधन पोर्टल से जोड़ा जाएगा, जिससे पशुपालकों की पहचान और विवरण का सत्यापन आसान हो सकेगा।
नीति की विशेष बात यह है कि वर्षों से बिना औपचारिक अनुमति के पारंपरिक रूप से चराई करने वाले पशुपालकों को भी मान्यता दी जाएगी। ऐसे पशुपालक पंजीकरण के बाद स्थानीय चराई सलाहकार समितियों के समक्ष आवेदन कर सकेंगे, जहां उनके मामलों की समीक्षा के बाद नियमानुसार नए चराई परमिट जारी किए जाएंगे।
वन क्षेत्रों के संरक्षण और चरागाहों के पुनर्जीवन को ध्यान में रखते हुए नीति में रोटेशनल ग्रेजिंग यानी क्रमबद्ध चराई व्यवस्था का प्रावधान किया गया है। चराई सलाहकार समितियां समय-समय पर चराई गतिविधियों की निगरानी और समीक्षा करेंगी। वन संरक्षक और जिला वन अधिकारी की अध्यक्षता वाली समितियां प्रत्येक पांच वर्ष में पर्यावरणीय परिस्थितियों के आधार पर चराई परमिटों की समीक्षा भी करेंगी।
नीति के अनुसार, जिन चराई परमिटों का उपयोग नहीं हो रहा है या जो अनुपस्थित व्यक्तियों के नाम पर दर्ज हैं, उन्हें जांच के बाद रद्द किया जाएगा। इसके बाद उपलब्ध चराई क्षमता को ग्राम सभाओं के माध्यम से वास्तविक और सक्रिय पशुपालकों को आवंटित किया जाएगा।
मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने कहा कि चराई नीति-2026 राज्य की ‘हरियाली भी, खुशहाली भी’ की सोच को साकार करती है। यह नीति चरागाहों के संरक्षण, पशुपालक परंपराओं के सम्मान और पशुधन पर निर्भर परिवारों के भविष्य को सुरक्षित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। उन्होंने कहा कि यह पहल पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीण समृद्धि के बीच संतुलन स्थापित करते हुए राज्य में टिकाऊ और सशक्त पशुपालन अर्थव्यवस्था की मजबूत नींव रखेगी।