फैसलों में देरी पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, हाई कोर्ट को तीन महीने में निर्णय सुनाने के निर्देश

30 मई: सुप्रीम कोर्ट ने देशभर के उच्च न्यायालयों में फैसले सुनाने में हो रही देरी पर गंभीर चिंता जताते हुए महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने शुक्रवार को कहा कि किसी भी मामले में फैसला सुरक्षित रखने के बाद उसे अधिकतम तीन महीने के भीतर सुनाया जाना चाहिए। यदि इस अवधि में निर्णय नहीं सुनाया जाता है, तो संबंधित उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल को मामला मुख्य न्यायाधीश के समक्ष प्रस्तुत करना होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने विशेष रूप से जमानत से जुड़े मामलों में त्वरित कार्रवाई पर जोर देते हुए कहा कि जमानत याचिकाओं पर आदेश उसी दिन सुनाया जाना चाहिए। यदि किसी कारणवश आदेश सुरक्षित रखा जाता है, तो उसे अगले दिन जारी कर न्यायालय की वेबसाइट पर अपलोड करना अनिवार्य होगा।

यह निर्देश झारखंड से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान जारी किए गए, जिसमें आरोप लगाया गया था कि उच्च न्यायालय में वर्ष 2022 से लंबित आपराधिक अपील पर अब तक फैसला नहीं सुनाया गया है। मामला अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के चार दोषियों की याचिका से संबंधित था।

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े मामलों, जैसे नियमित जमानत और अग्रिम जमानत याचिकाओं, में न्यायालयों को विशेष संवेदनशीलता और तेजी दिखानी चाहिए। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि जमानत या सजा पर रोक से संबंधित आदेशों की सूचना तुरंत जेल प्रशासन को भेजी जाए, ताकि पात्र व्यक्ति की रिहाई में अनावश्यक देरी न हो।

अदालत ने स्पष्ट किया कि आपराधिक मामलों, विशेषकर मृत्युदंड से जुड़े मामलों में, यदि फैसला सुरक्षित रखा जाता है तो न्यायाधीश सात दिनों के भीतर दोनों पक्षों से आवश्यक स्पष्टीकरण मांग सकते हैं। अन्य मामलों में फैसला सुरक्षित रखने के एक महीने बाद अतिरिक्त दलीलें या स्पष्टीकरण नहीं मांगे जा सकेंगे।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि कोई फैसला चार महीने तक भी लंबित रहता है, तो संबंधित पक्षकार मामले को किसी अन्य पीठ को सौंपने के लिए उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से अनुरोध कर सकते हैं।

इसके अलावा अदालत ने निर्देश दिया कि फैसले की प्रमाणित प्रति में फैसला सुरक्षित रखने की तारीख, निर्णय सुनाने की तारीख और वेबसाइट पर अपलोड करने की तारीख स्पष्ट रूप से दर्ज की जाए। फैसला अपलोड होने की सूचना पक्षकारों और उनके वकीलों को ई-मेल के माध्यम से उपलब्ध कराई जाए।

सुप्रीम कोर्ट ने सभी उच्च न्यायालयों के रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिया है कि वे इन दिशानिर्देशों को अपने-अपने मुख्य न्यायाधीशों के समक्ष रखें, ताकि आवश्यक नियम संशोधन कर इन्हें औपचारिक रूप से लागू किया जा सके।

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