20 अप्रैल: लद्दाख की प्राचीन सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने के लिए एक ऐतिहासिक पहल की गई है। 18 अप्रैल को लेह में देश के पहले पेट्रोग्लिफ कंजर्वेशन पार्क का शिलान्यास किया गया। यह पार्क सिंधु नदी के किनारे विकसित किया जाएगा, जहां हजारों साल पुराने शैलचित्रों को सुरक्षित रखा जाएगा।
इस परियोजना का शिलान्यास उपराज्यपाल विनय कुमार सक्सेना ने किया। पेट्रोग्लिफ ऐसे प्रागैतिहासिक चित्र और प्रतीक होते हैं, जिन्हें पत्थरों की सतह पर उकेरा जाता है और जो प्राचीन मानव जीवन व संस्कृति की महत्वपूर्ण जानकारी देते हैं।
लद्दाख में करीब 400 ऐसे स्थल चिन्हित किए गए हैं, जहां ये शैलचित्र पाए जाते हैं। लेकिन बढ़ते पर्यटन और तेजी से हो रहे निर्माण कार्यों के कारण ये धरोहर खतरे में पड़ रही है, खासकर जांस्कर नदी और सिंधु नदी के किनारे मौजूद पेट्रोग्लिफ्स।
इसी को ध्यान में रखते हुए इस कंजर्वेशन पार्क की योजना बनाई गई है। यहां कमजोर और दूरदराज क्षेत्रों से एकत्र किए गए पेट्रोग्लिफ्स को संरक्षित किया जाएगा और पर्यटकों के लिए प्रदर्शित भी किया जाएगा।
विरासत संरक्षण के इस प्रयास में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) और अभिलेखागार, पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग के बीच समझौता (MoU) भी किया गया है।
विशेषज्ञों के अनुसार, लद्दाख के पेट्रोग्लिफ 2,000 से 5,000 वर्ष पुराने हैं। इनमें से कुछ चित्र कांस्य युग (दूसरी से तीसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व) के हैं, जबकि बाद के चित्र 8वीं से 10वीं शताब्दी के शुरुआती तिब्बती काल से जुड़े माने जाते हैं।
वैश्विक स्तर पर भी पेट्रोग्लिफ अफ्रीका, साइबेरिया, स्कैंडिनेविया, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण-पश्चिमी उत्तरी अमेरिका में पाए जाते हैं। भारत में सबसे प्राचीन शैलचित्र भीमबेटका शैलाश्रय में मिले हैं, जो करीब 30,000 वर्ष पुराने माने जाते हैं।