वेतन समानता पर हाई कोर्ट सख्त: दूसरे राज्यों का पैटर्न लागू करना जरूरी नहीं

27 मार्च: हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने सरकारी कर्मचारियों की वेतन समानता से जुड़े एक अहम मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने राज्य प्रशासनिक न्यायाधिकरण (SAT) के वर्ष 2018 के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें सहकारिता विभाग के निरीक्षकों को पंजाब के समान संशोधित वेतनमान देने के निर्देश दिए गए थे।

मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह सांघीवालिया और न्यायमूर्ति रंजन शर्मा की खंडपीठ ने राज्य सरकार की याचिकाओं को स्वीकार करते हुए स्पष्ट किया कि किसी भी राज्य को दूसरे राज्य के वेतन ढांचे को अपनाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।

मामला सहकारिता विभाग के निरीक्षकों की उस मांग से जुड़ा था, जिसमें उन्होंने पंजाब के समान वेतनमान लागू करने की मांग की थी। इससे पहले न्यायाधिकरण ने उनके पक्ष में फैसला देते हुए वेतन और पेंशन लाभों के पुनर्निर्धारण के निर्देश दिए थे।

हालांकि, हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि हर राज्य की सेवा शर्तें, भर्ती प्रक्रिया, कार्य दायित्व और वित्तीय स्थिति अलग होती है, इसलिए वेतन संरचना का निर्धारण भी स्वतंत्र रूप से किया जाना चाहिए। कोर्ट ने यह भी माना कि केवल पदनाम की समानता के आधार पर वेतन समानता लागू नहीं की जा सकती।

अदालत ने स्पष्ट किया कि इस तरह के निर्देश देना न्यायाधिकरण के अधिकार क्षेत्र से बाहर था। इसी के साथ कोर्ट ने यह सिद्धांत दोहराया कि राज्यों के बीच वेतन समानता को अधिकार के रूप में लागू नहीं किया जा सकता।

इस फैसले का असर भविष्य में ऐसे सभी मामलों पर पड़ेगा, जहां कर्मचारी दूसरे राज्यों के आधार पर वेतन लाभ की मांग करते हैं।

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