18 मई: सरकार नियंत्रित मंदिरों के पुजारियों, सेवादारों और कर्मचारियों को न्यूनतम वेतन और अन्य सुविधाएं दिलाने की मांग को लेकर दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई से इनकार कर दिया। सोमवार को न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत इस मामले में हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता और प्रभावित व्यक्ति स्वयं अदालत का रुख कर सकते हैं।
सुनवाई के दौरान अदालत ने याचिकाकर्ता अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय से कहा कि वे पुजारियों के मामलों में दखल न दें, क्योंकि संभव है कि उन्हें मंदिरों में होने वाली आय और पुजारियों की वास्तविक कमाई की पूरी जानकारी न हो। हालांकि उपाध्याय ने अदालत को बताया कि इलाहाबाद हाईकोर्ट समेत कई उच्च न्यायालय पहले भी सरकार नियंत्रित मंदिरों में पुजारियों के वेतन की समीक्षा की बात कह चुके हैं, ताकि उन्हें सम्मानजनक जीवन मिल सके।
बाद में सुप्रीम कोर्ट ने याचिका वापस लेने की अनुमति दे दी और कानून के तहत उपलब्ध अन्य विकल्प अपनाने की छूट भी दी।
याचिका में केंद्र और राज्य सरकारों को निर्देश देने की मांग की गई थी कि वे सरकार नियंत्रित मंदिरों में कार्यरत पुजारियों और कर्मचारियों के वेतन, भत्तों और अन्य सुविधाओं की समीक्षा के लिए न्यायिक आयोग या विशेषज्ञ समिति का गठन करें।
अश्विनी उपाध्याय ने कहा कि वाराणसी स्थित काशी विश्वनाथ मंदिर में रुद्राभिषेक के दौरान उन्हें पता चला कि कई पुजारियों और कर्मचारियों को सम्मानजनक जीवन यापन के लिए पर्याप्त वेतन तक नहीं मिल रहा। याचिका में यह भी दावा किया गया कि आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में पुजारियों व मंदिर कर्मचारियों ने न्यूनतम वेतन की मांग को लेकर बड़े स्तर पर प्रदर्शन किए थे।
याचिका के अनुसार, मंदिर कर्मचारियों को सरकार द्वारा तय अकुशल और अर्ध-कुशल श्रमिकों के न्यूनतम वेतन से भी कम पारिश्रमिक दिया जा रहा है, जो न्यूनतम मजदूरी कानून और संविधान के नीति निर्देशक सिद्धांतों का उल्लंघन है। इसमें कहा गया कि बढ़ती महंगाई के बावजूद वेतन में सुधार नहीं होने से पुजारियों और कर्मचारियों का आर्थिक शोषण हो रहा है।