9 मई: प्रोफेसर (डॉ.) रेनू विज, चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी एवं अध्यक्ष, वूमेन काउंसिल, तथा डॉ. शिखा शर्मा, एसोसिएट प्रोफेसर, एपेक्स इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट, चंडीगढ़ विश्वविद्यालय ने कहा कि आधुनिक दौर में विकास की परिभाषा तेजी से बदल गई है। आज ऊँची इमारतें, बड़ी कंपनियाँ और विशाल इंफ्रास्ट्रक्चर को ही प्रगति का प्रतीक माना जा रहा है, लेकिन इस दौड़ में प्रकृति के साथ संतुलन लगातार कमजोर होता जा रहा है। पेड़ों की कटाई और पर्यावरण के अत्यधिक दोहन का असर अब लोगों के स्वास्थ्य पर साफ दिखाई देने लगा है।
उन्होंने बताया कि वर्तमान समय में छोटे बच्चे भी विटामिन-डी की कमी, मोटापा, उच्च रक्त शर्करा और त्वचा संबंधी समस्याओं जैसी बीमारियों से जूझ रहे हैं। यह केवल असंतुलित जीवनशैली का परिणाम नहीं, बल्कि प्रकृति से बढ़ती दूरी का भी प्रभाव है।
ऐसे समय में मोरिंगा (सहजन) एक प्राकृतिक और प्रभावी विकल्प के रूप में सामने आ रहा है। सामान्य रूप से अनदेखा किया जाने वाला यह पौधा पोषक तत्वों से भरपूर माना जाता है। मोरिंगा को उच्च रक्तचाप, मधुमेह, त्वचा रोगों सहित कई स्वास्थ्य समस्याओं में लाभकारी बताया गया है।
उन्होंने “हर घर मोरिंगा, हर घर स्वास्थ्य” की सोच को अपनाने पर जोर देते हुए कहा कि यदि प्रत्येक परिवार अपने घर या आसपास मोरिंगा का पौधा लगाए और इसे दैनिक आहार में शामिल करे, तो यह समाज के स्वास्थ्य सुधार की दिशा में बड़ा कदम हो सकता है।
इसी उद्देश्य को आगे बढ़ाते हुए “एक जीवन, एक रोशनी” पहल के तहत ट्राइसिटी क्षेत्र में प्रत्येक रविवार मोरिंगा चाय सेवा शुरू की गई है। इस अभियान का उद्देश्य केवल चाय उपलब्ध करवाना नहीं, बल्कि लोगों को स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करना और उन्हें प्रकृति के करीब लाना है।
उन्होंने कहा कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति को इस तरह के अभियानों से जुड़कर अपने आसपास के लोगों को मोरिंगा के लाभों के प्रति जागरूक करना चाहिए। यदि यह पहल जन-आंदोलन का रूप लेती है, तो इससे समाज में सकारात्मक और व्यापक बदलाव संभव है।
“मोरिंगा अपनाएं, स्वास्थ्य और हरियाली दोनों को जीवन का हिस्सा बनाएं।”