आयुर्वेद और फार्मेसी में गैर-लकड़ी वन उत्पादों की एकीकृत भूमिका पर आयोजित हुआ संवाद सत्र

11 सितम्बर: औद्यानिकी एवं वानिकी महाविद्यालय थुनाग स्थित गोहर (गुडैहरी) द्वारा राजकीय फार्मेसी कॉलेज सराज के सहयोग से कॉलेज परिसर में ‘आयुर्वेद और फार्मेसी में गैर-लकड़ी वन उत्पाद (एनटीएफपी) की एकीकृत भूमिका’ विषय पर संवादात्मक सत्र आयोजित किया गया।

महाविद्यालय के डीन के मार्गदर्शन और दोनों संस्थानों के बीच हुए समझौता ज्ञापन (एमओयू) के तहत आयोजित इस सत्र में राजकीय फार्मेसी कॉलेज सराज के निदेशक-सह-प्राचार्य प्रो. राजू एल. ने विशेषज्ञ एवं स्रोत व्यक्ति के रूप में भाग लिया। उन्होंने बीएससी फॉरेस्ट्री के विद्यार्थियों से संवाद करते हुए रोजमर्रा की जिंदगी में गैर-लकड़ी वन उत्पादों और कच्ची औषधीय सामग्री के महत्व की जानकारी दी।

उन्होंने पौधों की जड़, छाल, पत्ते, फूल, बीज और रेजिन सहित विभिन्न हिस्सों से प्राप्त होने वाले उत्पादों के उचित उपयोग और प्रयोगशाला स्तर पर उनके प्रसंस्करण के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने बताया कि स्थानीय समुदायों को लकड़ी के अलावा जंगलों से प्राप्त होने वाले विभिन्न उत्पादों और उनके औषधीय उपयोग की पारंपरिक जानकारी है। इनमें दवाओं में उपयोग होने वाली कशमल (बर्बेरिस) की जड़ें, ठंडक प्रदान करने के लिए बुरांश (रोडोडेंड्रोन आर्बोरियम) के फूलों का रस, बासोल (टैक्सस बैकाटा) के एंटी-कैंसर गुण, हल्दी के एंटी-माइक्रोबियल गुण तथा भुई आंवला (फाइलैंथस निरुरी) के पारंपरिक उपयोग शामिल हैं।

सत्र के दौरान विद्यार्थियों को कम से कम एक औषधीय पौधा उगाने के लिए प्रेरित किया गया, ताकि वे उसके बारे में व्यावहारिक जानकारी हासिल कर उसे दूसरों तक पहुंचा सकें। डॉ. राजू ने विद्यार्थियों से स्थानीय समुदायों के साथ मिलकर एनटीएफपी को व्यावसायिक स्वरूप देने और इनके माध्यम से ग्रामीण लोगों की आय बढ़ाने में योगदान देने का आह्वान किया।

कार्यक्रम का समन्वय सहायक प्रोफेसर (वन उत्पाद) डॉ. वंदना धीमान ने किया।

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