7 जून, रवी दत्त भारद्वाज: हिमाचल प्रदेश की पारंपरिक लोक संस्कृति और विलुप्त होती मुखौटा कला के संरक्षण की दिशा में जालग स्थित हाब्बी मानसिंह कला केन्द्र में आयोजित मुखौटा निर्माण एवं मुखौटा नृत्य प्रशिक्षण कार्यक्रम का मूल्यांकन किया गया। संगीत नाटक अकादेमी, नई दिल्ली की कला दीक्षा श्रृंखला के तहत आयोजित इस कार्यक्रम में प्रशिक्षु कलाकारों ने अपनी कला और रचनात्मकता का प्रभावशाली प्रदर्शन किया।
उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ाँ युवा पुरस्कार से सम्मानित लोक कलाकार गोपाल हाब्बी के मार्गदर्शन में आयोजित प्रशिक्षण के दौरान युवाओं को पारंपरिक मुखौटा निर्माण और विभिन्न मुखौटा नृत्यों की बारीकियां सिखाई गईं। कार्यक्रम में अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त लोक कलाकार एवं वर्ल्ड रिकॉर्ड होल्डर डॉ. जोगेन्द्र हाब्बी ने सहगुरु के रूप में तथा लोकगायक रामलाल वर्मा ने संगतकार के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
मूल्यांकन के लिए संगीत नाटक अकादेमी, नई दिल्ली से दीपक जोशी, रविन्द्र किरार और नरवीर सिंह पझौता जालग पहुंचे। इस दौरान गठित विशेषज्ञ समिति ने प्रशिक्षुओं की कला दक्षता का आकलन किया। युवा कलाकारों ने पारंपरिक शैली में मुखौटे तैयार कर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया, वहीं सिंहटू और डग्याली नाच की मनमोहक प्रस्तुतियों ने सभी का ध्यान आकर्षित किया।
कला दीक्षा कार्यक्रम के प्रभारी दीपक जोशी ने कहा कि गुरु-शिष्य परम्परा के माध्यम से देशभर में लोक एवं पारंपरिक कलाओं को संरक्षित करने का कार्य किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि मुखौटा निर्माण और उससे जुड़े कई लोकनृत्य समय के साथ विलुप्ति के कगार पर पहुंच गए हैं, ऐसे में ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रम इन कलाओं के संरक्षण और पुनर्जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
कार्यक्रम में पूर्व जिला परिषद सदस्या एवं कवयित्री शकुन्तला प्रकाश, शोधार्थी अजय ठाकुर, वरिष्ठ लोक कलाकारों तथा क्षेत्र के कई गणमान्य लोगों ने भी भाग लिया। विशेषज्ञों ने प्रशिक्षुओं के प्रदर्शन की सराहना करते हुए इसे लोक संस्कृति संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल बताया।
हाब्बी मानसिंह कला केन्द्र के प्रतिनिधियों ने कहा कि संस्थान का उद्देश्य युवाओं को नृत्य, गायन, वादन के साथ-साथ पारंपरिक मुखौटा निर्माण जैसी दुर्लभ कला में प्रशिक्षित करना है, ताकि प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित पहुंच सके।
समापन:
जालग में आयोजित यह प्रशिक्षण कार्यक्रम न केवल विलुप्त होती मुखौटा कला को नई पहचान दे रहा है, बल्कि युवाओं को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का भी कार्य कर रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे प्रयास भविष्य में हिमाचल की समृद्ध लोक संस्कृति को और अधिक सशक्त बनाने में अहम योगदान देंगे।