10 मई: हिमाचल प्रदेश में पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव को लेकर सियासी गतिविधियां तेज हो गई हैं। नामांकन प्रक्रिया के लिए अब केवल एक दिन शेष बचा है, ऐसे में कई संभावित उम्मीदवार नए नियमों और कानूनी प्रावधानों को लेकर असमंजस में नजर आ रहे हैं। पिछले दो दिनों में प्रदेशभर से 42 हजार से अधिक उम्मीदवारों ने नामांकन दाखिल किया है, लेकिन इसके साथ ही चुनाव लड़ने की पात्रता को लेकर चर्चाएं भी तेज हो गई हैं।
सरकार द्वारा हाल ही में नियमों में किए गए बदलावों ने कई दावेदारों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। नए प्रावधानों के अनुसार यदि परिवार के किसी सदस्य ने सरकारी भूमि पर अवैध कब्जा किया है, तो उससे जुड़े अन्य सदस्य भी चुनाव लड़ने से वंचित हो सकते हैं। पिता, माता, दादा-दादी या ससुर द्वारा किए गए अतिक्रमण की स्थिति में बेटे, पोते या बहू की उम्मीदवारी प्रभावित हो सकती है। पति-पत्नी में से किसी एक के नाम पर अवैध कब्जा होने पर दोनों चुनाव लड़ने के अयोग्य माने जाएंगे। वहीं अविवाहित पुत्री के नाम पर अवैध कब्जा पाए जाने पर उसकी उम्मीदवारी भी रद्द हो सकती है।
चुनावी नियमों की पूरी जानकारी न होने के कारण कई उम्मीदवार अंतिम समय में रेस से बाहर हो सकते हैं। इतना ही नहीं, यदि चुनाव जीतने के बाद भी आरोप सिद्ध होते हैं तो निर्वाचित प्रतिनिधि की सदस्यता तक जा सकती है।
भ्रष्टाचार या चुनावी अनियमितताओं में दोषी पाए गए लोगों पर भी चुनाव लड़ने पर रोक रहेगी। पंचायत या को-ऑपरेटिव सोसायटी के डिफाल्टर, पंचायत टैक्स या निधि का भुगतान न करने वाले और पंचायत की रिकवरी लंबित रखने वाले लोग भी चुनाव लड़ने के पात्र नहीं होंगे।
प्रदेश में इस बार कुल 31,182 पदों पर चुनाव होना है। इनमें ग्राम पंचायत सदस्य, प्रधान, उपप्रधान, पंचायत समिति सदस्य और जिला परिषद सीटें शामिल हैं। चुनावी माहौल गांवों से लेकर जिला मुख्यालय तक पूरी तरह गर्मा चुका है।
इसके अलावा 21 वर्ष से कम आयु के व्यक्ति, मतदाता सूची में नाम न होने वाले, अदालत द्वारा दिवालिया घोषित लोग, मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति और सरकारी लाभ के पद पर कार्यरत कर्मचारी भी पंचायत चुनाव नहीं लड़ सकेंगे। गंभीर आपराधिक मामलों में दोषी पाए गए लोगों की उम्मीदवारी भी रद्द की जा सकती है।