हिमालय संरक्षण को जन आंदोलन बनाकर राष्ट्र निर्माण से जोड़ना होगा: राज्यपाल कविंद्र गुप्ता

14 सितंबर: हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल कविंद्र गुप्ता ने कहा कि हिमालय केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि भारत की सभ्यता, संस्कृति, आध्यात्मिक चेतना और प्राकृतिक जीवन-व्यवस्था का आधार है। हिमालय हमारी पहचान, विरासत और जिम्मेदारी है। इसके संरक्षण को सरकारी प्रयासों तक सीमित रखने के बजाय जन आंदोलन का स्वरूप देना होगा, तभी हिमालय संरक्षण के साथ राष्ट्र निर्माण के संकल्प को मजबूती मिलेगी।

राज्यपाल शनिवार को धर्मशाला में हिमालय परिवार हिमाचल प्रदेश और हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित “हिमालय संरक्षण से राष्ट्र निर्माण की ओर” विषय पर एक दिवसीय अभिमुखीकरण एवं भावी रणनीति संगोष्ठी और पुस्तक विमोचन समारोह को बतौर मुख्य अतिथि संबोधित कर रहे थे।

उन्होंने कहा कि हिमालय से निकलने वाली नदियां देश के विशाल भू-भाग को जीवन प्रदान करती हैं। यहां की जैव विविधता, पारंपरिक ज्ञान, लोक संस्कृति और प्राकृतिक संसाधन अमूल्य धरोहर हैं। जलवायु परिवर्तन, जलस्रोतों का संकट, वनाग्नि, भूस्खलन और बादल फटने जैसी घटनाएं हिमालय की संवेदनशीलता की गंभीर चेतावनी दे रही हैं। ऐसे में विकास और पर्यावरण के बीच संघर्ष के बजाय दोनों के बीच संतुलन स्थापित करना समय की आवश्यकता है।

नेपाल में हाल में आई प्राकृतिक आपदा का उल्लेख करते हुए राज्यपाल ने कहा कि हिमालयी क्षेत्र की संवेदनशीलता को समझते हुए वैज्ञानिक अध्ययन, समयबद्ध पूर्व चेतावनी प्रणाली, आपदा प्रबंधन की तैयारी और स्थानीय समुदायों के प्रशिक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए। पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील विकास के लिए सामूहिक प्रयास जरूरी हैं। उन्होंने नेपाल में आपदा से प्रभावित परिवारों के प्रति संवेदना व्यक्त करते हुए कहा कि ऐसी घटनाएं याद दिलाती हैं कि हिमालय का संरक्षण केवल पर्यावरण संरक्षण का विषय नहीं, बल्कि मानव जीवन, क्षेत्रीय सुरक्षा और पूरे समाज के भविष्य से जुड़ा विषय है।

कविंद्र गुप्ता ने कहा कि एक युवा पौधा लगाकर उसकी देखभाल करे, कोई गांव अपने जलस्रोत को पुनर्जीवित करे, नागरिक प्रदूषण रोकने में सहयोग करें या समुदाय अपनी लोक संस्कृति और विरासत को सुरक्षित रखे, तो ऐसे छोटे-छोटे प्रयास मिलकर हिमालय संरक्षण और राष्ट्र निर्माण की बड़ी शक्ति बन सकते हैं।

उन्होंने हिमालय परिवार के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि वृक्ष संरक्षण, जलस्रोतों का पुनर्जीवन, आपदा प्रबंधन, सांस्कृतिक संरक्षण, युवा नेतृत्व और राष्ट्रीय एकता जैसे विषयों को एक साथ जोड़कर कार्य करना समग्र एवं संतुलित विकास की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

राज्यपाल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के “एक पेड़ मां के नाम” अभियान का उल्लेख करते हुए कहा कि पर्यावरण संरक्षण में युवाओं और आम नागरिकों की भागीदारी बेहद महत्वपूर्ण है। भारत का विकास तभी सार्थक होगा, जब आर्थिक प्रगति के साथ पर्यावरणीय स्थिरता, सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक संरक्षण भी सुनिश्चित हो।

हिमालय परिवार की ओर से प्रस्तुत धर्मशाला घोषणा-2026 का स्वागत करते हुए राज्यपाल ने कहा कि किसी भी घोषणा की सफलता केवल उसके दस्तावेज तक सीमित नहीं होती, बल्कि उसके प्रभावी क्रियान्वयन से होती है। उन्होंने उम्मीद जताई कि इस घोषणा के माध्यम से हिमालय संरक्षण, जलस्रोतों के पुनर्जीवन, आपदा तैयारी और सामुदायिक सहभागिता को नई दिशा मिलेगी।

उन्होंने कहा कि हिमालय संरक्षण की शुरुआत प्रत्येक व्यक्ति अपने घर, विद्यालय, गांव और आसपास के पर्यावरण से कर सकता है। प्लास्टिक का उपयोग कम करना, पेड़ों की रक्षा करना, स्थानीय जैव विविधता को समझना, आपदा के समय स्वयंसेवा करना तथा लोक संस्कृति एवं परंपराओं को आगे बढ़ाना ऐसे कदम हैं, जिनका व्यापक प्रभाव पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि हिमालय ने हमें नदियां, वन, जैव विविधता, जीवन-दिशा, सभ्यता और संस्कृति दी है। अब हमारी बारी है कि आने वाली पीढ़ियों के लिए इस अमूल्य धरोहर का संरक्षण करें। सुरक्षित हिमालय ही सुरक्षित समाज, सशक्त भारत और विकसित भारत की मजबूत नींव बनेगा।

कार्यक्रम के दौरान विभिन्न विषयों पर प्रकाशित पुस्तकों का विमोचन भी किया गया। इनमें अशोक बेरी की “समरस समाज- विकसित भारत का आधार” तथा प्रेम कैथ की “हैंडबुक ऑन हिमाचल प्रदेश एक्साइज लॉ” प्रमुख हैं। राज्यपाल ने लेखकों को बधाई देते हुए कहा कि पुस्तकों के माध्यम से समाज में समरसता, राष्ट्र निर्माण और प्रशासनिक क्षेत्र में व्यावहारिक ज्ञान को बढ़ावा मिलता है।

इस दौरान हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. एस.पी. बंसल और हिमालय परिवार के संस्थापक डॉ. इंद्रेश कुमार ने भी हिमालय संरक्षण को लेकर अपने विचार रखे। कार्यक्रम में राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य अशोक बेरी, राष्ट्रीय कार्यकारिणी अध्यक्ष डॉ. परमजीत सिंह गिल, पंजाब विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग के चेयरमैन हिमांशु अग्रवाल, हिमालय परिवार हिमाचल प्रदेश के प्रांतीय अध्यक्ष मोहिंदर सिंह सलारिया, आयोजन से जुड़े पदाधिकारी, विश्वविद्यालय के शिक्षक, अधिकारी और विभिन्न क्षेत्रों से आए प्रतिभागी उपस्थित रहे।

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