11 जुलाई: शिमला स्थित हिप्पा संस्थान में आयोजित ‘टुवर्ड्स रेजिलिएंस इंफ्रास्ट्रक्चर प्लानिंग इन हिमालय’ कार्यशाला के समापन समारोह में मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने हिमाचल प्रदेश को प्राकृतिक आपदाओं के प्रति अधिक सुरक्षित बनाने के लिए करीब 3,500 करोड़ रुपये की लागत से आपदा-रोधी आधारभूत संरचना विकसित करने की घोषणा की। उन्होंने कहा कि राज्य की भौगोलिक परिस्थितियों के कारण यहां प्राकृतिक आपदाओं का खतरा लगातार बना रहता है। ऐसे में भविष्य की चुनौतियों से निपटने के लिए मजबूत और टिकाऊ इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करना सरकार की प्राथमिकता है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि वर्ष 2023 की भीषण आपदा के दौरान राज्य में फंसे करीब 75 हजार पर्यटकों को सुरक्षित निकाला गया था। उन्होंने चंद्रताल क्षेत्र से 300 पर्यटकों के सफल रेस्क्यू अभियान के लिए राजस्व मंत्री जगत सिंह नेगी और विधायक संजय अवस्थी की सराहना की। उन्होंने बताया कि वर्ष 2023 की आपदा में करीब 23 हजार मकान क्षतिग्रस्त हुए और 51 लोगों की मौत हुई थी। इसके बाद सरकार ने राहत नीति में बड़ा बदलाव करते हुए पूरी तरह क्षतिग्रस्त मकानों का मुआवजा 1.30 लाख रुपये से बढ़ाकर 8 लाख रुपये कर दिया।
मुख्यमंत्री ने कहा कि वर्ष 2023 के अनुभवों के आधार पर सरकार ने आपदा प्रबंधन प्रणाली को और अधिक मजबूत किया, जिसके चलते वर्ष 2025 में आई प्राकृतिक आपदाओं के दौरान नुकसान अपेक्षाकृत कम रहा। उन्होंने बादल फटने की बढ़ती घटनाओं के लिए जलवायु परिवर्तन और बड़े बांधों के जलाशयों से बढ़ते वाष्पीकरण को भी प्रमुख कारण बताया।
इस अवसर पर मुख्यमंत्री ने हाइड्रो-मौसम संबंधी आपदाओं पर तैयार विशेष रिपोर्ट का विमोचन किया और हिमाचल सोशल इम्पैक्ट असेसमेंट मैनेजमेंट सिस्टम (एसआईएयू) पोर्टल का शुभारंभ किया। उन्होंने कहा कि यह पोर्टल डेटा आधारित निर्णय लेने, विभिन्न विभागों के बीच समन्वय बढ़ाने और प्रशासनिक कार्यों को अधिक प्रभावी बनाने में मददगार साबित होगा।
कार्यक्रम में राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के उपाध्यक्ष दीपक राठौर ने मजबूत प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली, संवेदनशील हिमनदीय झीलों की निगरानी और पर्वतीय क्षेत्रों के लिए अलग इंजीनियरिंग मानकों की आवश्यकता पर बल दिया। मुख्य सचिव के.के. पंत ने कहा कि सरकार का उद्देश्य केवल क्षतिग्रस्त ढांचों का पुनर्निर्माण करना नहीं, बल्कि भविष्य की आपदाओं का सामना करने में सक्षम मजबूत और टिकाऊ आधारभूत संरचना तैयार करना है। वहीं, नीति आयोग के पूर्व सदस्य डॉ. वी.के. पॉल ने जलवायु परिवर्तन को गंभीर चुनौती बताते हुए सभी विभागों के समन्वित प्रयासों और दीर्घकालिक रणनीति अपनाने की आवश्यकता पर जोर दिया।