10 जुलाई: हिमाचल प्रदेश की पारंपरिक और स्वदेशी हिमालयन गद्दी कुत्ता नस्ल को राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी पहचान मिली है। इस नस्ल के दो श्वानों, स्कूबी और पुट्टी, का देश के प्रतिष्ठित शुद्ध नस्ल पंजीकरण निकाय में आधिकारिक पंजीकरण किया गया है। विशेषज्ञों ने इसे देशी श्वान नस्लों के संरक्षण और वैज्ञानिक संवर्धन की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया है।
हिमालयन गद्दी कुत्ता लंबे समय से हिमाचल प्रदेश और पश्चिमी हिमालय क्षेत्र के गद्दी समुदायों का विश्वसनीय साथी रहा है। यह नस्ल भेड़-बकरियों के झुंडों की सुरक्षा, जंगली जानवरों से बचाव और दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों में चरवाहों की सहायता के लिए जानी जाती है। हालांकि, विदेशी नस्लों के बढ़ते चलन के कारण इसकी संख्या और पहचान लगातार प्रभावित हो रही थी।
स्कूबी और पुट्टी के पंजीकरण से इस स्वदेशी नस्ल के संरक्षण, शुद्ध प्रजनन और वैज्ञानिक अध्ययन को नई दिशा मिलेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे भविष्य में हिमालयन गद्दी कुत्ते की मूल विशेषताओं को सुरक्षित रखने और नस्ल के विकास में मदद मिलेगी। यह उपलब्धि केवल दो श्वानों के पंजीकरण तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी नस्ल के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
यह सफलता हिमाचल प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय के डॉ. जी.सी. नेगी कॉलेज ऑफ वेटरनरी एंड एनिमल साइंसेज के वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं के वर्षों के अध्ययन का परिणाम है। शोध के दौरान नस्ल की शारीरिक बनावट, व्यवहार, आनुवंशिक विशेषताओं और पारंपरिक उपयोग का विस्तृत दस्तावेजीकरण किया गया, जिसके आधार पर राष्ट्रीय स्तर पर पंजीकरण संभव हो सका।
इस परियोजना में प्रोफेसर शिवानी कटोच ने अहम भूमिका निभाई, जबकि पशुपालन विभाग ने भी संरक्षण अभियान को आगे बढ़ाने में सक्रिय सहयोग दिया। विभाग के तत्कालीन सचिव रितेश चौहान ने प्रशासनिक स्तर पर आवश्यक समर्थन प्रदान कर इस पहल को सफल बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस पहल से हिमालयन गद्दी कुत्ता नस्ल की पहचान देशभर में मजबूत होगी और अन्य राज्यों को भी अपनी स्वदेशी पशु नस्लों के संरक्षण तथा वैज्ञानिक संवर्धन के लिए प्रेरणा मिलेगी। यह उपलब्धि भारत की समृद्ध पशुधन विरासत और जैव विविधता के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण उदाहरण मानी जा रही है।