चंडीगढ़/बीबीएन, 13 अप्रैल (शांति गौतम):
पंजाब की राजनीति में कुछ नाम ऐसे होते हैं जो पदों से नहीं, बल्कि अपने बेबाक रवैये और सत्ता से टकराने के अंदाज़ के लिए पहचाने जाते हैं। जगमीत सिंह बराड़ उन्हीं नेताओं में शामिल हैं, जिन्होंने हमेशा सवाल उठाने की राजनीति की।
23 मई 1958 को श्री मुक्तसर साहिब में जन्मे बराड़ का राजनीति से जुड़ाव पारिवारिक रहा। उनके पिता गुरमीत सिंह बराड़ पंजाब सरकार में मंत्री रह चुके थे। इसके बावजूद उन्होंने पारंपरिक राजनीति से अलग राह चुनी—खुलकर बोलने और असहमति जताने की।
पंजाबी विश्वविद्यालय, पटियाला से शिक्षा और कानून की पढ़ाई ने उनकी सोच को तर्क और संवैधानिक आधार दिया। यही कारण रहा कि वे हर मंच पर मुद्दों को कानूनी और तार्किक तरीके से उठाते नजर आए।
कांग्रेस में रहते हुए उन्होंने नेतृत्व के केंद्रीकरण, हाईकमान संस्कृति और पंजाब की अनदेखी जैसे मुद्दों पर खुलकर आवाज उठाई। इससे वे कार्यकर्ताओं के बीच लोकप्रिय हुए, लेकिन शीर्ष नेतृत्व से टकराव भी बढ़ता गया।
1999 में फरीदकोट से लोकसभा चुनाव जीतकर वे सांसद बने। संसद में उन्होंने किसानों, पंजाब की अर्थव्यवस्था और केंद्र-राज्य संबंधों जैसे अहम मुद्दों को मजबूती से उठाया। उनकी पहचान एक सक्रिय और मुखर सांसद की रही।
समय के साथ पार्टी नेतृत्व से मतभेद बढ़े और 2016 में उन्हें कांग्रेस से निष्कासित कर दिया गया। इस पर उनका बयान—“अगर सच बोलना बग़ावत है, तो हाँ—मैं बाग़ी हूँ”—काफी चर्चा में रहा।
कांग्रेस के बाद उन्होंने अन्य राजनीतिक दलों के साथ भी काम किया, लेकिन हमेशा यही कहा कि उनके लिए पार्टी नहीं, बल्कि मुद्दे अहम हैं।
जगमीत सिंह बराड़ को आज भी एक बेखौफ, स्पष्टवादी और सिस्टम से टकराने वाले नेता के रूप में देखा जाता है। खासकर मालवा क्षेत्र में उन्हें “सच बोलने वाला नेता” और “पंजाब की आवाज़” माना जाता है।
उनकी राजनीति एक बड़ा सवाल छोड़ती है—क्या हर असहमति को बगावत मान लेना सही है?
जगमीत सिंह बराड़ भले ही सत्ता के करीब कम रहे हों, लेकिन मुद्दों और सवालों के केंद्र में हमेशा बने रहे हैं।