9 जुलाई, स्वास्तिक गौतम : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के वरिष्ठ प्रचारक और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के प्रमुख संगठनकर्ताओं में शामिल मदनदास देवी का जीवन राष्ट्र सेवा, संगठन निर्माण और सादगी का प्रेरक उदाहरण माना जाता है। 9 जुलाई 1942 को महाराष्ट्र के सोलापुर जिले के करमाला में जन्मे मदनदास देवी ने उच्च शिक्षा के दौरान एम.कॉम. में स्वर्ण पदक प्राप्त किया, एलएलबी की डिग्री हासिल की और चार्टर्ड अकाउंटेंट (सीए) भी बने। बेहतर करियर की संभावनाओं के बावजूद उन्होंने प्रचारक बनकर अपना जीवन राष्ट्र सेवा के लिए समर्पित कर दिया।
वर्ष 1964 में वे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़े और संगठन में विभिन्न जिम्मेदारियां निभाते हुए 1970 में राष्ट्रीय संगठन मंत्री बने। लगभग 22 वर्षों तक उन्होंने इस दायित्व का सफलतापूर्वक निर्वहन किया। वर्ष 1992 में उन्हें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का अखिल भारतीय सह प्रचारक प्रमुख तथा 1993 में सह सरकार्यवाह बनाया गया। विदेशों में रहने वाले स्वयंसेवकों के लिए उन्होंने ‘पारिवारिक शाखा’ की अवधारणा विकसित की, जो आज कई देशों में अपनाई जा रही है।
वर्ष 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में केंद्र सरकार बनने के बाद उन्हें संघ और सरकार के बीच समन्वय की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी गई। उन्होंने संगठन और सरकार के बीच बेहतर तालमेल बनाने में अहम भूमिका निभाई। बाद में उन्हें संघ की केंद्रीय कार्यकारिणी का सदस्य तथा दीनदयाल शोध संस्थान का संरक्षक भी बनाया गया।
मदनदास देवी का मानना था कि विद्यार्थी परिषद केवल छात्र राजनीति का मंच नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण और शिक्षा क्षेत्र में सकारात्मक परिवर्तन का माध्यम है। उन्होंने संगठन में छात्राओं की भागीदारी बढ़ाने, कार्यकर्ताओं के व्यक्तित्व विकास और वैचारिक संवाद को विशेष महत्व दिया। उनकी सरल कार्यशैली, अनुशासन और कार्यकर्ताओं के प्रति आत्मीय व्यवहार ने उन्हें एक आदर्श संगठनकर्ता के रूप में स्थापित किया।
24 जुलाई 2023 को बेंगलुरु में उनका निधन हो गया। आज भी उनका जीवन संगठन, सेवा, सादगी और राष्ट्र के प्रति समर्पण का प्रेरक उदाहरण माना जाता है।