22 जनवरी 1948… इतिहास का वह काला अध्याय, जिसने पाकिस्तान के कुर्रम ज़िले के पाराचिनार क्षेत्र में रहने वाली सिख-हिंदू बिरादरी को कभी न भरने वाला ज़ख्म दिया। इस दिन धर्म परिवर्तन से इनकार करने पर सैकड़ों निर्दोष लोगों की निर्मम हत्या कर दी गई। इसी नरसंहार से बचकर कुछ परिवार भारत पहुंचे, जिनकी यादें आज भी हिमाचल प्रदेश के चंबा में जीवित हैं।
पाराचिनार नरसंहार के चश्मदीदों में से एक हरवंश गुलाटी उस समय मात्र 11–12 वर्ष के थे। उन्होंने अपनी आपबीती साझा करते हुए बताया कि नवंबर 1947 में हिंदुओं और सिखों को जबरन घरों से निकालकर टेंटों में रखा गया। कड़ाके की ठंड में यह कहकर रोका गया कि उन्हें जल्द भारत भेज दिया जाएगा, लेकिन यह एक सोची-समझी साजिश थी।
22 जनवरी 1948 की शाम, सेना के अधिकारियों ने टेंटों में बंद लोगों को बाहर निकालकर धर्म परिवर्तन का दबाव बनाया। जब बिरादरी के बुजुर्गों ने इनकार किया, तो निहत्थे लोगों पर गोलियां चला दी गईं। चारों ओर चीख-पुकार मच गई और सैकड़ों लोग मौके पर शहीद हो गए। बाद में भारत सरकार के हस्तक्षेप से हिंसा रुकी और बचे लोग किसी तरह भारत पहुंचे।
भारत पहुंचने पर पीड़ितों ने तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू से मुलाकात की और ठंडे क्षेत्रों में बसने की इच्छा जताई। इसके बाद कई परिवार मसूरी, शिमला और अंततः चंबा के जुलाहकड़ी क्षेत्र में आकर बस गए। आज भी यहां पाराचिनार बिरादरी के लोग रहते हैं और एक गुरुद्वारे में उस समय लाया गया गुरु ग्रंथ साहिब सुरक्षित है, जिसे बुजुर्ग पीठ पर बांधकर भारत लाए थे।
हर वर्ष 22 जनवरी को पाराचिनार शहीदों की स्मृति में शहीदी दिवस मनाया जाता है। बिरादरी के लोगों का कहना है कि यह दिन केवल एक तारीख नहीं, बल्कि आस्था, बलिदान और इंसानियत की कीमत याद दिलाने वाला दिन है। 