आवाज़ ए हिमाचल
शाहपुर (कांगड़ा):
प्रस्तावित विद्युत (संशोधन) विधेयक, 2025 के विरोध में हिमाचल प्रदेश राज्य बिजली बोर्ड के कर्मचारियों, इंजीनियरों और पेंशनभोगियों की संयुक्त कार्रवाई समिति ने शाहपुर में एक सम्मेलन आयोजित कर जोरदार विरोध दर्ज कराया। सम्मेलन में वक्ताओं ने विधेयक को जनविरोधी, कर्मचारी-विरोधी और संघीय ढांचे के खिलाफ बताया। 
सम्मेलन को संबोधित करते हुए कर्मचारी-अभियंता राष्ट्रीय समन्वय समिति के संयोजक सुदीप दत्ता ने कहा कि विद्युत अधिनियम, 2003 के लागू होने के 22 वर्ष बाद भी बिजली वितरण क्षेत्र गंभीर वित्तीय संकट से जूझ रहा है। उन्होंने बताया कि वितरण कंपनियों का संचयी घाटा 26 हजार करोड़ से बढ़कर लगभग 6.9 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। ऐसे में नया संशोधन विधेयक समस्याओं का समाधान करने के बजाय बिजली क्षेत्र के बड़े पैमाने पर निजीकरण का रास्ता खोलता है।
सुदीप दत्ता ने चेतावनी दी कि प्रस्तावित प्रावधानों के तहत निजी कंपनियों को उच्च राजस्व वाले औद्योगिक क्षेत्रों में प्रवेश मिलेगा, जबकि ग्रामीण और घरेलू उपभोक्ताओं का भार सरकारी बिजली बोर्ड पर ही रहेगा। इससे न केवल बोर्ड की आर्थिक स्थिति कमजोर होगी, बल्कि आम उपभोक्ताओं पर भी अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। उन्होंने 12 फरवरी 2026 को राष्ट्रीय स्तर पर बिजली कर्मचारियों की हड़ताल का आह्वान किया।
जॉइंट एक्शन कमेटी के सह-संयोजक हीरा लाल वर्मा ने कहा कि तथाकथित “कैरिज और कंटेंट के पृथक्करण” का मॉडल क्रॉस-सब्सिडी व्यवस्था को खत्म कर देगा, जिससे घरेलू उपभोक्ताओं के लिए बिजली दरों में भारी बढ़ोतरी तय है। उन्होंने आरोप लगाया कि स्मार्ट मीटरिंग को भी निजी कंपनियों के हित में आगे बढ़ाया जा रहा है।
वक्ताओं ने कहा कि बिजली संशोधन विधेयक, 2025 लागू होने की स्थिति में कर्मचारियों की सेवा शर्तें, पेंशनभोगियों की सामाजिक सुरक्षा और आउटसोर्स कर्मचारियों का भविष्य खतरे में पड़ जाएगा। संयुक्त कार्रवाई समिति ने केंद्र सरकार से विधेयक को तत्काल वापस लेने, बिजली को सामाजिक अधिकार के रूप में मान्यता देने और निजीकरण पर पूर्ण रोक लगाने की मांग की।
सम्मेलन में समिति के पदाधिकारी नितीश भारद्वाज, कामेश्वर दत्त शर्मा, कुलदीप खरवाड़ा, आर.आर. राणा, सूर्या कांत शर्मा और ई. प्रशांत शर्मा भी उपस्थित रहे।