10 अगस्त: प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने और किसानों को रसायनमुक्त खेती की ओर प्रेरित करने के प्रदेश सरकार के प्रयासों का मंडी जिले में सकारात्मक असर देखने को मिल रहा है। जिले में बड़ी संख्या में किसान प्राकृतिक खेती को अपना रहे हैं और इसे बेहतर आय का माध्यम बना रहे हैं।
राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन के तहत जिले में रसायनमुक्त खेती को बढ़ावा देने, सुरक्षित एवं पौष्टिक खाद्यान्न उत्पादन, मिट्टी की उर्वरता में सुधार और किसानों की खेती लागत कम करने पर विशेष जोर दिया जा रहा है। वर्तमान में मंडी जिले के 48,380 किसान प्राकृतिक खेती से जुड़े हैं, जबकि 8,400 हेक्टेयर भूमि प्राकृतिक खेती के दायरे में लाई जा चुकी है।
वर्ष 2025-26 के दौरान 2,500 हेक्टेयर क्षेत्र, 50 क्लस्टर और 8,214 किसानों को योजना से जोड़ा गया। वहीं वर्ष 2026-27 में 1,000 हेक्टेयर अतिरिक्त भूमि, 20 नए क्लस्टर और 2,500 नए किसानों को प्राकृतिक खेती से जोड़ने का लक्ष्य रखा गया है।
किसानों को उनकी प्राकृतिक खेती से तैयार उपज का बेहतर मूल्य दिलाने के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य के तहत खरीद भी की जा रही है। पिछले दो वर्षों में कृषि विभाग ने 1040.81 क्विंटल मक्का, 644.24 क्विंटल गेहूं और करीब 233 क्विंटल हल्दी की खरीद की है।
घांघल गांव के किसान प्रताप सिंह ने आत्मा परियोजना के तहत प्रशिक्षण लेने के बाद प्राकृतिक खेती शुरू की। उन्होंने गेहूं के साथ मटर और चने की मिश्रित खेती की। उनके अनुसार पहले गेहूं का मूल्य 60 रुपये प्रति किलोग्राम मिलता था, जो अब बढ़कर 80 रुपये हो गया है। इसी तरह मक्की का मूल्य भी 40 से बढ़कर 60 रुपये प्रति किलोग्राम हुआ है। उन्होंने एमएसपी में वृद्धि को किसानों के लिए लाभकारी बताते हुए प्रदेश सरकार का आभार जताया।
सुंदरनगर तहसील के ढंडोल गांव के किसान मस्तराम भी प्राकृतिक खेती से लाभ उठा रहे हैं। उन्होंने मक्की, सोयाबीन, अदरक और हल्दी की खेती शुरू की है। इस वर्ष उन्होंने एक बीघा भूमि में ड्रैगन फ्रूट भी लगाया है। पांच बीघा भूमि पर प्राकृतिक तरीके से तैयार करीब 65 हजार रुपये का गेहूं और 25 हजार रुपये की मक्की उन्होंने सरकार को बेची। उनका कहना है कि हल्दी का समर्थन मूल्य 90 रुपये से बढ़ाकर 150 रुपये प्रति किलोग्राम किए जाने से किसानों को काफी लाभ मिला है।
वर्ष 2026-27 के लिए प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के उद्देश्य से करीब 4.93 करोड़ रुपये की कार्ययोजना प्रस्तावित की गई है। इसके तहत नए कम्युनिटी रिसोर्स पर्सन की नियुक्ति, किसानों के प्रशिक्षण एवं जागरूकता कार्यक्रम, प्रोत्साहन राशि, प्राकृतिक खेती का प्रमाणन, अध्ययन सामग्री और किट वितरण सहित अन्य गतिविधियां शामिल हैं।
जिले के 14 विकास खंडों में 20 नए क्लस्टरों के लिए कम्युनिटी रिसोर्स पर्सन का चयन किया गया है। ये किसान प्राकृतिक खेती की तकनीकों का प्रशिक्षण देने के साथ खेतों में प्रदर्शन और योजना के क्रियान्वयन में सहयोग करेंगे। किसानों को जीवामृत, घन जीवामृत और अन्य जैविक संसाधन स्थानीय स्तर पर उपलब्ध करवाने के लिए जिले में 13 बायो रिसोर्स सेंटर भी स्थापित किए जाएंगे।
उप परियोजना निदेशक आत्मा मंडी हितेंद्र कुमार के अनुसार प्राकृतिक खेती अपनाने वाले किसानों को स्वदेशी नस्ल की गाय खरीदने के लिए 25 हजार रुपये की वित्तीय सहायता दी जाती है। गोमूत्र संग्रहण के लिए गौशाला का फर्श पक्का करने हेतु 8 हजार रुपये तथा जीवामृत और घन जीवामृत तैयार करने के लिए तीन ड्रमों पर 2,250 रुपये का अनुदान दिया जा रहा है। किसानों को प्राकृतिक खेती का निशुल्क प्रशिक्षण, किट और तकनीकी मार्गदर्शन भी उपलब्ध करवाया जा रहा है।
प्राकृतिक खेती से उत्पादित फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी के बाद किसानों का इस पद्धति के प्रति भरोसा और उत्साह बढ़ा है। बेहतर दाम मिलने से किसान प्राकृतिक खेती को पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ लाभकारी कृषि व्यवसाय के रूप में भी अपना रहे हैं।