कर्ज का बोझ बढ़ा: हिमाचल पर एक लाख करोड़ से अधिक देनदारी, वित्तीय दबाव गहराया

11 फरवरी: राजस्व घाटा अनुदान (आरडीजी) में कटौती के बीच हिमाचल प्रदेश की वित्तीय स्थिति गंभीर होती नजर आ रही है। राज्य पर कुल देनदारी एक लाख करोड़ रुपये से अधिक पहुंच चुकी है, जिससे वह देश के सर्वाधिक कर्ज लेने वाले राज्यों में पांचवें स्थान पर आ गया है। अनुमान के अनुसार, प्रदेश में जन्म लेने वाले प्रत्येक नागरिक पर औसतन करीब 1.33 लाख रुपये का कर्ज है।

आंकड़ों के मुताबिक, अगले दस वर्षों में सरकार को लगभग 22 हजार करोड़ रुपये का कर्ज चुकाना है। वहीं सालाना वेतन (करीब 13,837 करोड़ रुपये), पेंशन (लगभग 10,850 करोड़ रुपये) और सब्सिडी (करीब 2,508 करोड़ रुपये) जैसी बड़ी वित्तीय प्रतिबद्धताएं भी सरकार पर हैं। पूर्व में हर वर्ष मिलने वाली 9 से 10 हजार करोड़ रुपये की आरडीजी सहायता इन दायित्वों को संतुलित करने में सहायक थी, लेकिन इसके बंद होने से वित्तीय दबाव और बढ़ गया है।

कर्मचारी-पेंशनरों की देनदारियां लंबित

वर्तमान में कर्मचारियों और पेंशनरों के लगभग 11 हजार करोड़ रुपये लंबित बताए जा रहे हैं। इसमें करीब 10 हजार करोड़ रुपये नए वेतनमान के एरियर और लगभग 1 हजार करोड़ रुपये महंगाई भत्ते (डीए) की बकाया राशि शामिल है।

बोर्ड-निगमों की स्थिति

राज्य के कई सार्वजनिक उपक्रम (बोर्ड और निगम) भी वित्तीय घाटे से जूझ रहे हैं। अनुमानित रूप से इन पर करीब 5 हजार करोड़ रुपये का घाटा है। एचआरटीसी और बिजली बोर्ड जैसे उपक्रमों की वित्तीय स्थिति भी चिंता का विषय बनी हुई है।

कर्ज में बढ़ोतरी का क्रम

वर्ष 2017 में प्रदेश पर लगभग 47,906 करोड़ रुपये का कर्ज था। 2022 में सरकार बदलने तक यह बढ़कर 76,630 करोड़ रुपये पहुंच गया। वर्तमान कार्यकाल के तीन वर्ष से अधिक समय में यह आंकड़ा एक लाख करोड़ रुपये से पार हो चुका है।

रोजगार और प्रवासन

प्रदेश में सीमित रोजगार अवसरों के चलते युवाओं का रुझान विदेशों की ओर बढ़ा है। अनुमान है कि करीब 10 हजार युवा रोजगार के लिए विदेश जाते हैं और प्रतिवर्ष लगभग 2,030 करोड़ रुपये राज्य में भेजते हैं। इसके अतिरिक्त करीब 5 हजार छात्र उच्च शिक्षा के लिए विदेश जाते हैं।

वेतन-भत्तों में बढ़ोतरी

वित्तीय चुनौतियों के बीच इस वर्ष जनप्रतिनिधियों के वेतन और भत्तों में लगभग 24 प्रतिशत वृद्धि की गई है, जिससे सरकारी कोष पर करीब 24 करोड़ रुपये का अतिरिक्त वार्षिक भार पड़ेगा। हालांकि टेलीफोन भत्ता समाप्त किया गया है और बिजली-पानी के बिल स्वयं जमा करने का प्रावधान किया गया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में राज्य को वित्तीय अनुशासन, संसाधनों के बेहतर प्रबंधन और राजस्व सृजन के नए उपायों पर विशेष ध्यान देना होगा, ताकि आर्थिक संतुलन बनाए रखा जा सके।

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